संदेश

न्याय

वह काशी नरेश कि रानी थी, नाम था करुणा। नाम करना ज़रूर था, लेकिन व्यवहार था उसके विपरीत। उन दिनों जब महारानी गंगा किनारे स्नान करने जाया करती थी, तो उस स्थान पर किसी को भी नहीं रहने दिया जाता था। वहां झोपड़ियों में रहने वालों को उस स्थान को रिक्त कर देना पड़ता था। केवल महारानी एवं उनकी दासियाँ ही गंगा किनारे स्नान हेतु रहती थीं। प्रातःकाल का समय वह भी माघ का महीना था। स्नान करने के पश्चात महारानी शीत में कांपने लगीं। आसपास कहीं ऐसी व्यवस्था नहीं थी जिससे महारानी अग्नि प्रज्जवलित कर शीत से राहत पा सकती। अतः उन्होंने एक दासी को आज्ञा दी कि उन रिक्त झोपड़ी में से एक झोपड़ी में आग लगा दो ताकि सर्दी से राहत पाने के लिए वे हाथ-पैर सेंक सके। दासी बोली - “महारानी! इन झोपड़ी में या तो कोई निर्धन परिवार के लोग रहते होंगे, अथवा कोई साधु संत। झोपड़े को जला देने से उनके रहने की क्या व्यवस्था होगी? वे बेचारे कहां जाएंगे। लेकिन रानी तो राज महल में रहती थी, उन्हें गरीबों के कष्ट का भला क्या अनुभव हो सकता था। उनका स्वभाव तो आज्ञा-पालन कराने का बन गया था। अतः उन्होंने दूसरी दासी से यह कहते हुए ...

मानव लक्ष्य

अस्वस्थ पिता ने अपने छोटे पुत्र को पैसे दिए एवं डॉक्टर की बताई हुई दवा लाने के लिए बाज़ार भेजा। वह लड़का उछलते-कूदते घर से निकला और बाज़ार की ओर चल दिया। थोड़ी दूर ही गया होगा कि रास्ते में एक जगह भीड़ का मजमा देखा,  जो गोलाकार में खड़े होकर कोई तमाशा देख रहा था। लड़के का आकर्षण उस भीड़ की तरफ हुआ और अंदर घुसकर देखा कि एक मदारी बंदर एवं बंदरिया को नचा रहा है, लोग उधर उस तमाशा को देखने में मशगूल हैं। दवा लाने की बात भूल कर वह लड़का भी तमाशा देखने लगा। बचपन में सभी इस खेल को देखते रहे होंगे। मदारी बंदरिया को कहता है, अरी,  तू इस बंदर के साथ ससुराल जा,  तेरी इस के साथ शादी हुई है। बंदरिया सर हिलाकर अस्वीकार कर देती है। आज से ५०-६० वर्ष पूर्व भी बंदरों का खेल मदारी इस तरह दिखाता रहा है, अब भी वैसे ही दिखाता रहता है। उस तरीके में कोई परिवर्तन नहीं। तो वह लड़का भूल गया कि मैं तो दवा  लाने के लिए निकला था। जब खेल समाप्त हुआ तो आगे बढ़ा। आगे एक रीछवाला रीछ नचा रहा था।  कुछ देर उसे देखता रहा। खेल तो हो उसका अंत तो होता ही नहीं है। इस तरह रीछ का खेल भी समाप्त हुआ। ...

प्रेमपात्र

श्री रामानुजाचार्य के जीवन में घटी एक घटना का वर्णन आता है। रंगदास नामक एक सेठ था जो एक वेश्या पर आसक्त था।  एक दिन रंगदास उस वेश्या के साथ प्रभु श्री रंगनाथजी के मंदिर  के सामने से जा रहा थे। वेश्या आगे-आगे मस्ती से चली जा रही थी, जब सेठ उस वेश्या के सर पर छाता तने हुए पीछे-पीछे सेवक की तरह चल रहा था।  ठीक उसी समय रामानुजाचार्य जी मंदिर से बाहर निकल रहे थे। उन्होंने इस दयनीय दृश्य को देखा। सेठ को भी जानते थे। उनकी वेश्या में इतनी आसक्ति देखकर रामानुजाचार्य जी को दुख हुआ। उन पर दया का भाव आया एवं उनके जीवन को सही दिशा देने का निश्चय किया। रास्ते पर जाकर वे सेठ रंगदास से मिले एवं बोले कि वेश्या में आपका इतना प्रेम देखकर मुझे बड़ा आनंद मिल रहा है। यह निश्चय है कि आप इनके सौंदर्य के कारण ही इनमें आसक्त होकर प्रेम करते हैं।  मेरे प्रभु श्री रंगनाथजी इतने अधिक सुंदर हैं कि उनकी सुंदरता की तुलना इस पृथ्वी के किसी भी प्राणी से नहीं हो सकती। यदि आप मेरे प्रभु से प्रेम करने लग जायें तो आप का कल्याण हो जाएगा। प्रेम करने योग्य तो केवल परमात्मा ही हैं।  इतना कहकर रामानुज...

दान की सार्थकता

वीरभद्र अपनी दान-वीरता के लिए बहुत प्रसिद्ध थे।  लेकिन दान के कारण व राज्य परिवार की सुख-सुविधाओं के लिए पर्याप्त धन खर्च होता रहा एवं धीरे-धीरे राजकोष खाली हो गया। फलस्वरूप तरह-तरह के नए कर प्रजाओं पर लगाए गए। प्रजा भी एक और जहां उनकी दान-वीरता का गुण गाया करती थी, दूसरी और अत्यंत कर भार के विरोध से अपना असन्तोष भी प्रकट करती थी।  राज्य की अस्त-व्यस्त स्थिति का लाभ उठाकर पड़ोसी राजा ने आक्रमण कर वीरभद्र के राज्य पर कब्ज़ा कर सम्राट को एवं रानी को बंदी बना लिया, लेकिन बाद में वे दोनों बंदीगृह से किसी प्रकार भाग निकले। उनके पास कोई साधन ना होने से जंगलों में भटकने लगे। रानी ने एक प्रस्ताव रखा कि सेमरगढ़ नगर का एक सेठ पुण्य खरीदता है, क्यों ना उसके पास जाकर अपना पुण्य का कुछ अंश बेज दिया जाए।  इसमें उदरपूर्ति की व्यवस्था तो कम से कम हो सकती है।  विचार विमर्श के बाद ऐसा ही करना निश्चित हुआ। गन्तव्य स्थान दूर था, रास्ते में पति-पत्नी मज़दूरी कर-कर अपना निर्वाह करते चले रहे थे।  एक बार कठिनाई से मिली मज़दूरी में चार रोटी जितने आटे की व्यवस्था हो सकी। वे रोटी पाक...

वायदे वायदों के लिए है

कवि सम्मलेन, मानस सम्मलेन आदि अनके प्रकार के सम्मलेन होते रहते हैं। लेकिन यह सम्मलेन अपने में विचित्रता लिए हुए था। यह सम्मलेन पाँच असमर्थ एवं अपंग लोगों का था। प्रथम सदस्य अंधे व्यक्ति ने सम्मलेन का प्रारम्भ करते हुए कहा, “यदि मेरी आँखें होती तो जहाँ बुराई देखता उसका सुधार करने का प्रयास करता एवं अच्छा ही अच्छा देखता।” दूसरा सदस्य जो लँगड़ा था, उसने प्रथम का समर्थन करते हुए अपनी राय दी “बात सही है, यदि मेरे भी पैर होते तो मैं दौड़-दौड़कर अपंगों की मदद करता। तीसरा जो दोनों अंगों से ठीक था, लेकिन निर्धन था, उसने अपनी समस्या बताते हुए कहा, “यदि मेरे पास धन होता तो, मैं सारा धन परोपकार एवं जनहित में लगाता।” चौथा निरक्षर मूर्ख था, उसने भी अपनी दिक्कत बताई, “मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, अन्यथा मैं देश में अशिक्षता को मिटाने में अपना समय लगाता।” अन्तिम सदस्य जो शरीर से अस्वस्थ एवं क्षीणकाय था, उनकी भी समस्या थी, “यदि मुझमें शारीरिक बल होता तो निर्बल एवं दुःखी जनों पर कभी अत्त्याचार नहीं होने देता।” उपलब्ध साधनों का किसी प्रकार उपयोग का विचार न करते हुए प्रारब्ध को दोषी ठहराकर सम्मलेन समाप्त ह...

परख

ठाकुर श्री रामकृष्णदेव की साधनास्थली दक्षिणेश्वर के जमींदार नवीन रायचौधरी के पुत्र योगेन का विवाह हो गया था, लेकिन वे अधिकतर रात्रि में घर न जाकर ठाकुर की सेवा में पड़े रहते थे। जब सब लोग रात्रि में अपने घर चलें जाएँ तब वे ठाकुर की सेवा का कोई अवसर प्राप्त कर सके, इसी आकांक्षा से रहते थे। एक दिन रात्रि में ठाकुर ने भोजन किया एवं योगेन ने भी भोजन कर लिया। ठाकुर अपनी बड़ी खटिया पर सोने के लिए लेट गए। योगेन भी भूमि पर बिस्तर लगाकर सो गये। मध्य रात्रि में ठाकुर को बाहर जाने की आवश्यकता पड़ी। योगेन की तरफ़ देखा, जोकि गाढ़ निद्रा में सो रहा था। उनको इस गाढ़ निद्रा में जगाना ठीक नहीं समझा, स्वयं ही दरवाज़ा खोलकर बाहर जंगल की तरफ चले गए। थोड़ी देर बाद ही योगेन की आँखें खुलीं, देखा घर का दरवाज़ा खुला पड़ा है। पलंग पर ठाकुर नहीं हैं। अकेले कहाँ चले गए इतनी रात में। निवृत्त होने जाते तो लोटा-तौलिया लेकर जाते, जोकि वहीँ रखे थे। हो सकता है चाँदनी रात में गंगा तट पर टहलने निकले हों, इस समय सुहावनी हवा बह रही है, उसी का आनंद ले रहें हों। चल कर देखते हैं गंगा तट पर। लेकिन यह क्या यहाँ भी तो नहीं हैं। कहीं...

प्रभु से कहो

बन्दर का बच्चा अपनी माँ को अपने हाथ-पाँव से पकड़ कर रहता है। उसकी माँ जब एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर उछल कर जाती है, वह बच्चा बहुधा उस झटके से अपनी माँ के बन्धन से छूटकर गिर जाता है, उसे चोट लग जाती है। लेकिन बिल्ली के बच्चे को बिल्ली अपने दाँतों से दबाकर चलती है। बच्चे को कोई चिंता नहीं रहती की उसकी माँ उसे कहाँ ले जाएगी। चाहे राखी के ढेर पर ले जाए, या किसी बिछे हुए मुलायम बिचौने पास ले जाए। जहाँ मर्ज़ी हो वहाँ ले जाए। बच्चे को कोई चिंता नहीं, कि कभी वह माँ से बिछुड़ जाएगा। कारण माँ ही अपने दाँतों से उसको पकड़े हुए है। वह पकड़ मज़बूत है। इसके बदले कहीं बच्चा माँ को पकड़ता तो वह पकड़ किसी झटके से ढीली भी पड़ सकती है। ठाकुर रामकृष्ण परमहंस अपने भक्तों से कहा करते थे कि ठीक बिल्ली के बच्चों की तरह ही अपने इष्ट से कहो कि “हे भगवान! हमारा हाथ पकड़े रहो। तुम्हारी पकड़ से मैं कभी नहीं अलग हो पाऊंगा। कारण तुम्हारी पकड़ मज़बूत है। मैं तुम्हें पकड़ने में असमर्थ हूँ। यह रहा मेरा हाथ, इसे सख़्ती से पकड़ कर मुझे निहाल कर दो।” एक दूसरा दृष्टान्त भी वह देते थे। एक खेत में से दो बच्चों को लेकर एक किसान चला जा रह...

वास्तविकता न भूलें

एक बहुत साधारण व्यक्ति था। वह कम पढ़ा-लिखा होने के साथ निर्धन भी था। नौकरी की तलाश में बम्बई पहुँचा। बम्बई में और कोई नौकरी तो मिली नहीं, एक सेठ जी के यहाँ झाड़ू देने का काम करने लगा। प्रतिदिन प्रातः काल आता, लंबी-चौड़ी दुकान में झाड़ू लगाता। दिन में भी कई बार सफाई करता और जब भी खाली समय मिलता कोई न कोई किताब लेकर बैठ जाता। पढ़ता भी, लिखता भी। उसकी लिखावट बहुत सुन्दर थी। एक दिन सेठ जी ने उसे लिखते हुए देखा; बोले ,”अरे! तू लिखना भी जानता है?” वह बोला, “जी थोड़ा-थोड़ा लिख लेता हूँ। सेठ जी ने उसे चिट्ठियाँ लिखने पर लगा दिया। अब वह खूब परिश्रम से सँवार कर चिट्ठियाँ लिखने लगा। उसके लिखने का और विषय को प्रस्तुत करने का ढंग बहुत सुंदर था। चिट्ठी में हिसाब-किताब की बात आती तो उसे भी वह खूब अच्छी प्रकार समझा-बुझाकर लिखता। सेठ जी ने उसे एक दिन उसके द्वारा लिखे गये पत्र को देखा, बोले, “अरे! तू हिसाब-किताब भी जनता है?” वह बोला, “जी थोड़ा-बहुत जानता हूँ।” सेठ जी ने उसे मुनीम बना दिया। थोड़े समय बाद ही उसके कार्य से प्रसन्न होकर उसे हेड मुनीम बना दिया। अब दूसरे मुनीम जलने लगे। ईर्ष्या का भाव ...

तेती पाँव पसारिये जेती लाँबी सौर

अकबर बादशाह बैठे थे राज्यसभा  में। एक कारीगर ने एक बहूत सुंदर रेशमी चादर लाकर उन्हें दी। बहूत अच्छे और सुंदर रंगों के फूल उस पर बने थे। महाराज ने चादर खोली और देखा की उनके शरीर से कुछ छोटी है। तभी उन्हें एक बात सूझी। चादर को ओढ़कर बोले, “देखो भाई, मैं फर्श पर लेटता हूँ। चादर को मेरे ऊपर उड़ा दो।” अकबर भूमि पर बिछे क़ालीन पर लेट गये। कारीगर ने चादर उन पर ओढाई तो पाँव खुले रह गए। पाँव ढांपे तो सिर कि ओर खुला रह गया। बादशाह ने कहा, “अरे! छोड़ो, तुम एक अशिक्षित शिल्पी हो। ये बड़े-बड़े विद्वान दरबारी बैठे हैं, इन्हें यह कार्य करने दो। आओ भाई चादर तो इस प्रकार उढाओ कि कोई अंग नंगा न रहे।” उनमे से एक व्यक्ति बहार आये। उन्होंने प्रयत्न किया, परंतु परिणाम वही, सिर ढका तो पाँव खुले रह गये, पाँव ढके तो सिर पर चादर नहीं। बादशाह अकबर ने क्रोध से कहा, “मूर्ख हो तुम! हटो यहाँ से, किसी दूसरे को आने दो।” एक और व्यक्ति आया। उन्होंने भी प्रयत्न किया परंतु, परिणाम फिर वही। तब एक व्यक्ति और आये, फिर और, फिर और, फिर और…. जो, सब के सब दरबारी आये। कोई भी अकबर बादशाह के ऊपर वह चादर इस प्रक...

कृपण-कथा

कृपणता एक प्रकार की अनुदारता है। कृपण व्यक्ति से न तो दूसरे का हित होता है और न अपना ही। यहाँ पर कई कृपाणों (कंजूसों) की कथा संक्षेप में दी जा रही है। एक कंजूस था, जो घी के डिब्बे को अच्छी प्रकार बाँधकर एक दीवार के साथ लटकाये रखता और भोजन करते समय उसकी ओर देख-देखकर सुखी रोटी और बिना घी की सब्ज़ी खा लेता था। वह व्यक्ति एक दिन एक दूसरे कंजूस से मिला। दोनों अपनी-अपनी कृपणता की बातें करने लगे। घी वाले ने कहा, “मैंने दो वर्ष पूर्व एक लोटा घी ख़रीदा था, अभी तक उसका बहुत बड़ा भाग ज्यों-का-त्यों पड़ा है।” दूसरे कंजूस ने पूछा, “तुम उसका प्रयोग कैसे करते हो?” पहला बोला, “भोजन करते समय उसकी ओर देख लेता हूँ। उसकी गंध सूंघ लेता हूँ।” दूसरे ने कहा, “बहुत अपव्ययी हो तुम! अरे, घी रोटी के ऊपर भले ही मत लगाओ, हवा लगने से वह काम तो होता है। उसका रस तो सूखता है। हमारे घर में सात वर्ष पूर्व का एक पंखा है। मेरे दादाजी ने उसे ख़रीदा था। सारा घर उसका प्रयोग करता है। अभी तक वह ज्यों-का-त्यों है। बिलकुल वैसे जैसा सात वर्ष पूर्व था।” पहले ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? तुम सब जब सात वर्ष से उसका प्रयोग ...