संदेश

संयम के कारण

बात उन दिनों की है जब नेपोलियन छात्रावस्था में था। उन दिनों अक्लोनी नामक स्थान में उन्हें एक नाई के घर में रहना पड़ा था। नेपोलियन बहुत सुंदर एवं सुकुमार थे, उनकी आकृति में आकर्षण था। नाई की स्त्री उन पर मुक्त हो गई थी और नेपोलियन को अपनी और आकर्षित करने का प्रयत्न निरंतर करती रहती थी। लेकिन नेपोलियन को तो अध्ययन से ही अवकाश नहीं मिलता था। वह स्त्री जब भी उनसे हँसने-बोलने का प्रयास करती, तब तब उन्हें किसी ना किसी पुस्तक में निमग्न देखती। इस कारण स्त्री की इच्छा की पूर्ति नहीं हुई। समय बीता। वही नेपोलियन देश का सेनापति चुना गया। सेनापति होने के बाद उसी नाई के यहां जाने का एक बार फिर अवसर आया। तब वे काफी बड़े हो गए थे, पहचाने भी नहीं जा सकते थे। दुकान पर नाई की स्त्री बैठी थी। नेपोलियन उसके पास जाकर पूछा, “क्या तुम को स्मरण है कि कभी तुम्हारे यहां बोनापार्ट नाम का कोई युवक कुछ दिनों के लिए रहा था?” नाई  की स्त्री झुंझलाकर बोली, “बस… बस रहने दो महोदय। वैसे नीरस व्यक्ति का मैं नाम लेना भी पसंद नहीं करती। किसी से मीठी बात करना तो उसने सीखा ही नहीं था। यहां तक कि उसको नाचना-गाना भ...

सादगी

रामशास्त्री, पेशवा माधवराव के गुरु थे, साथ ही वह पेशवा के मंत्री और राज्य के न्यायाधीश भी थे। फिर भी उनका रहन-सहन और पहनावा बड़ा सादा और मामूली था। एक बार उनकी पत्नी किसी पर्व के अवसर पर राजभवन में गई। उनकी अत्यंत साधारण वेशभूषा देखकर रानी चकित रह गई। रानी ने उन्हें कीमती कपड़े और रतजड़ित आभूषण पहनाये, फिर राजसी पालकी में उन्हें विदा किया। पालकी रामशास्त्री के घर पहुंची। कहारों ने द्वार खटखटाया। द्वार खुला और फिर तुरंत बंद हो गया। कहार बोले, “शास्त्री जी आपकी धर्म पत्नी आई हैं।” शास्त्री जी बोले, “मेरी पत्नी ऐसे कीमती कपड़े और गहने नहीं पहन सकती। वस्त्राभूषण से सजी हुई यह देवी कोई और ही है, तुम लोग भूल से यहां आ गए हो।” शास्त्री जी की पत्नी अपने पति के स्वभाव को खूब पहचानती थी। उन्होंने कहारों को राजभवन लौट चलने को कहा। रानी-वास में पहुँचकर उन्होंने रानी से कहा, “आपके इन वस्त्र और आभूषणों ने तो मेरे घर का द्वार ही मेरे लिए बंद करा दिया है।” सब कपड़े-गहने उतार कर और अपने साधारण कपड़े पहनकर शास्त्री जी की पत्नी पैदल ही घर लौटी। इस बार रामशास्त्री सजल, गर्वोन्नत नेत्रों स...

अच्छी फसल

जर्मनी की सेना का कोई उच्चाधिकारी किसी युद्ध के समय अपने शिविर से कुछ सैनिकों को साथ लेकर घोड़ों के लिए खास एकत्रित करने के लिए चले। समीप में एक गांव के किसान को उन्होंने पकड़ा और कहा, “चल कर बताओ कि इस गांव में किस खेत में अच्छी फसल है।” विवश होकर किसान उन सैनिकों के साथ चल पड़ा। खेत लह-लहा रहे थे। बहुत उत्तम फसल थी। सैनिक चाहते थे कि उन खेतों की फसल काट लें, किंतु किसान बार-बार यही कहता चाहता था, “कुछ और आगे चलिए, आगे बहुत अच्छी फसल है।” धीरे-धीरे किसान सैनिकों को लगभग गांव की सीमा के खेतों तक ले गया। वहां उसने एक खेत बतलाया। सैनिकों ने उस खेत से फसल काट कर गठ्ठे बांधे और घोड़ों पर रख लिए। सैनिक अधिकारी ने क्रोधित होकर किसान को डांटा, “तू व्यर्थ ही हमें इतनी दूर ले आया। इससे अच्छी फसल तो पास के खेतों में ही थी।” किसान ने कहा, “मैं जानता था कि आप लोग खेत के स्वामी को फसल का मूल्य नहीं देंगे। इतना समझते हुए मैं किसी दूसरे का खेत बतला कर उसकी हानि कैसे करा सकता था? यह मेरा अपना खेत है। ये तो आप भी मानेंगे कि मेरे लिए तो इसकी फसल सबसे अच्छी फसल है।” सैनिक अधिकारी लज्जित हो गय...

आपसी फूट

एक व्याध ने पक्षियों को फँसाने के लिए अपना जाल बिछाया। जाल में दो पक्षी फंसे, किंतु उन पक्षियों ने झटपट सलाह की और जाल को लेकर उड़ने लगे। व्याध को यह देख कर बड़ा दुख हुआ। वह उन पक्षियों के पीछे भूमि पर दौड़ने लगा। कोई ऋषि अपने आश्रम में बैठे यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने व्याध को समीप बुलाकर पूछा, “तुम व्यर्थ क्यों दौड़ रहे हो? पक्षी तो जाल लेकर आकाश में उड़ रहे हैं।” व्याध बोला, “भगवान, अभी इन पक्षियों में मित्रता है। वे परस्पर मेल करके एक दिशा में उड़ रहे हैं। इसी से वे  मेरा चाल लिए जा रहे हैं। परंतु कुछ देर में इन में झगड़ा हो सकता है। मैं उसी समय की प्रतीक्षा में इनके पीछे दौड़ रहा हूं। परस्पर झगड़ा कर जब वे गिर पड़ेंगे, तब मैं उन्हे पकड़ लूँगा।” व्याध की बात ठीक निकली। थोड़ी देर उड़ते-उड़ते जब पक्षी थक, तब उनमे इस बात को लेकर विरोध हो गया कि उन्हें कहा ठहरना चाहिए। विरोध होते ही उनके उड़ने की दिशा और पंखों की गति समान नहीं रह गई। इसका फल यह हुआ कि वह उस जाल को संभाल नहीं रख सके। जाल  के भार से लड़खड़ाकर स्वयं भी गिरने लगे और एक बार गिरना प्रारंभ होते ही जाल में ...

विषयासक्त इंद्रियाँ

एक नगर में एक बाबू रहता था, उसके दो औरतें थीं। वे दोनों ही बड़ी बलिष्ठ एवं लड़ाकू थीं। ईर्ष्या द्वेषवश आपस में झगड़ा टंटा किया करती थीं। बाबू दिनभर ऑफिस में काम करता। कभी-कभी ज्यादा काम होने के कारण वह  सायं बड़ी देर से घर पहुँचता था। इन औरतों को समझाते-समझाते वह तंग हो गया था। किसी भी प्रकार से शांति से नहीं रहती थीं। एक दिन वह बड़ी देर से घर पहुंचा। वहां उसने देखा कि दोनों का अखाड़ा खूब जमा हुआ है, एक दूसरे को मुफट गालियां दे रही हैं। एक औरत ऊपर रहती थी और एक नीचे। जब बाबू सीडी द्वारा ऊपर जाने लगा तो नीचे वाली औरत ने उसका पैर पकड़ लिया और गर्जना के साथ ताना देती हुई बोली, “तू ऊपर क्यों जाता है? इस घर में प्रथम में आई हूं, इसलिए मैं तेरे को कभी ऊपर राँड के पास नहीं जाने दूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए।” जब ऊपर वाली औरत को मालूम हुआ की नीचे वाली मेरी सौत उसे ऊपर नहीं आने देती है, तब वह सौत को गालियां देते हुए उसके हाथ को ऊपर से पकड़ लिया और कहने लगी कि, “छोड़ इसके पैर को राँड! ऊपर आने दे, यह नीचे तेरे यहां नहीं रहेगा, तेरे फंदे से छूटने के लिए ही तो यह मुझको इस घर में लाया है।” बाबू...

महाचाण्डाल

गंगा के किनारे एक साधू अपनी कुटिया बनाकर रहते थे। एक दिन उन्होंने अपने कपड़े धोए। धूप अच्छी थी, वहां गंगा के किनारे रेत पर सुखाने के लिए डाल दिए। तब स्वयं नहां-धोकर अपनी कुटिया में जाकर बैठ गए। तभी वहां एक चाण्डाल आया। उसे भी गर्मी लग रही थी। उसने सोचा, गंगा जी के शीतल जल में स्नान कर लूं। स्नान करने के पश्चात बाहर निकला तो सोचा कपड़े मैले हो गए हैं, इन्हें भी धो लूँ। बस कपड़े धोने लगा। कपड़े धोने की आवाज़ कुटिया में पहुंची तो साधु ने सोचा कि कपड़े कौन धोता है? बाहर आकर देखा तो वहां एक चाण्डाल कपड़े धो रहा था। यह भी देखा कि उसके कपड़ों से उड़ने वाले छींटे साधु के सूखे हुए कपड़ों पर गिर रहे हैं। बस फिर क्या था, चढ़ गया क्रोध। दौड़ते हुए वह साधु चाण्डाल के पास पहुंचे और गालियां देते हुए बोले, “तू अंधा है? चाण्डाल होकर यहां कपड़े धोता है? तेरे अपवित्र छींटों ने मेरे कपड़ों को अपवित्र कर दिया।” आगे चढ़कर दो, तीन, चार चपत उन्होंने चाण्डाल के मुंह पर लगा दी। चाण्डाल हाथ जोड़कर खड़ा रहा। साधु महाराज चिल्लाकर बोले, “फिर मत आना इस स्थान पर।” साधु महाराज थे बूढ़े और दुर्बल, चाण्डाल था हृष्ट...

वास्तविक साथी

एक था युवक। नाम रामदास, जाति का गुसाई। एक गांव में अपने पिता के साथ रहता था। पिता मंदिर में पूजा करते थे। लोगों के घरों में मंत्र आदि भी पढ़ते थे। बेटा रामदास उन्हें देखता, पूजा-पाठ में उसकी रुचि भी थी, परंतु उस विद्या को प्राप्त ना कर सका। एक दिन आया जब रामदास के पिता का देहांत हो गया। माता पहले से ही चल बसी थीं। दूसरा कोई संबंधी था नहीं। पिता की मृत्यु के बाद रामदास के लिए यह संसार सूना हो गया। कभी उसने अपने पिता से भगवान का नाम सुना था। दुखी अवस्था में उसने सोचा, “उसी भगवान से मिलूंगा जो सबका अपना है। परंतु भगवान से मिले कैसे? पाए कहां पर?” यह तो उसे पता नहीं था। एक महात्मा के पास पहुंचा उनसे प्रार्थना की, कहा, “मुझे भगवान का दर्शन करा दो, उससे मिला दो।” महात्मा बोले, “यह बहुत कठिन कार्य है, सरलता से होगा नहीं, इसके लिए बहुत परिश्रम करना होगा।” रामदास ने कहा, “मैं करूँगा परिश्रम।” महात्मा बोले, “बहुत अच्छी बात है। वह है कुटिया, उसमें बैठकर भगवान का नाम लिया कर। भोजन तुझे मिल जाएगा। खाने और सोने से अवकाश मिलते ही जप किया कर।” रामदास ने ऐसा करना प्रारंभ किया। परंतु प्रभु के लिए ज...

आत्मा मुख्य है, शरीर नहीं

एक था घुड़सवार। पहुंच गया किसी गांव में अपने एक मित्र के पास। मित्र ने उसे देखा तो अपने कमरे में ले गया। उसके घोड़े को बाहर आँगन में बाँधा। यात्री को कमरे में बैठा कर बाहर से बंद कर दिया और घोड़े के पास पहुंच कर उसे पानी पिलाया। घास और दाना खिलाया। तब उसे मालिश करने लगा। खुरैरा लेकर उसकी सेवा करने लगा; उसकी टांगें भी दबाने लगा कि बेचारा दूर से आया है, थक गया होगा। स्वयं वह व्यक्ति भांग पीता था। निश्चित समय पर भांग पिता और जुट जाता घोड़े की सेवा में। घोड़े को गर्मी न लगे, इसलिए उसको पंखे से हवा करता। उसका रंग खराब ना हो इसलिए उसे खूब ज़ोर से मल-मलकर नहलाता। व दुर्बल ना हो जाए, इस ,लिए उसे अच्छे से अच्छा खाना खिलाता। इस प्रकार तीन दिन हो गए। बेचारा यात्री कमरे में बंद खिड़की से देखता की घोड़े की बहुत सेवा हो रही है, उसे खूब संवारा जा रहा है। यात्री आश्चर्यचकित था कि इस व्यक्ति को हो क्या गया है? अतिथि मैं हूं, मित्र मैं हूं, किंतु मेरी परवाह न करके इस घोड़े की सेवा में अहर्निशि लगा हुआ है। तीन दिन व्यतीत हो गए तो एक साधू उधर से निकला। उसने उस व्यक्ति को घोड़े की सेवा करते देखा! बोला, “ख...

निकम्मापन

दो व्यक्ति अफ़ीम खाकर एक पेड़ के नीचे बैठे थे। वृक्ष था बेर का। शाखा से एक बेर गिरा। एक अफीमची की छाती पर आ पड़ा। परंतु वह अफीमची ही क्या जो हाथ-पाँव हिलाए। रातभर बेर उसकी छाती पर पड़ा रहा और वह प्रतीक्षा करता रहा कि दूसरे अफीमची उठे और बेर को उसके मुंह में डाल दे; परंतु दूसरा भी तो अफीमची था। वह भी रात भर लेटा रहा, उठा नहीं। प्रातः एक व्यक्ति उधर से निकला। उसने ध्यान से उन दोनों को देखा। पहले समझा, शायद मर गए हैं, मिलते-डुलते नहीं। शायद रात में किसी सर्प अथवा विषैले कीड़े ने काट लिया है और दोनों के प्राण-पखेरु उड़ गए हैं। परंतु पास गया तो देखा कि दोनों की आँखें खुली हैं। दोनों टुकुर-टुकुर देख रहे हैं। आश्चर्य से उसने पूछा, “तुम्हें क्या हुआ है?” वह पैर वाले के पास खड़ा था। वीर वाले ने धीमी आवाज़, “यह बेर उठा कर मेरे मुंह में डाल दो।” उस व्यक्ति ने  बेर उठाया, उसके मुंह में डाल दिया, बोला, “ यह बेर क्या अभी गिरा है?” अफीमची ने कहा, “नहीं भाई! रात से  पड़ा है!” उस व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा, “रात से यह पड़ा है, तुम्हारे दोनों हाथ विद्यमान हैं, तुमने इसे उठाया क्यों ...

गुरु की परख

संत दादू चले गए एक नए स्थान में। नगर से दूर जंगल में रहने लगे। ज्यों-ज्यों लोगों को पता लगा, त्यों-त्यों वे जंगल में आकर ही प्रभु भक्ति का अमृत पीने लगे। शहर के कोतवाल ने भी संत दादू के संबंध की बातें सुनी। उनके मन में भी आया कि चलकर उस महात्मा के दर्शन करूँ, जिसकी प्रसंशा कितने ही लोग करते हैं। अपने घोड़े पर चढ़कर कोतवाल जंगल की ओर चल दिए। काफी दूर जाने पर भी संत दादू का पता नहीं लगा। हाँ, एक व्यक्ति अवश्य दिखाई दिया दुबला पतला शरीर, केवल एक लंगोटी पहने, वह झाड़ियों को साफ कर रहा था। मार्ग की झाड़ियों को काटता और बाहर फेक देता, ताकि मार्ग साफ हो जाए। कोतवाल ने उसके पास जाकर पूछा, “अरे ओ! पता है कि संत दादू कहाँ रहते हैं?” उस व्यक्ति ने कोतवाल की ओर देखा परंतु बोला नहीं। कोतवाल ने समझा, यह  बहरा है, चिल्लाकर बोले, “अरे मूर्ख, मैं पूछता हूं कि दादू कहां रहता है?” इस बार उस व्यक्ति ने कोतवाल की तरफ देखा भी नहीं, अपना काम करता रहा। कोतवाल को क्रोध आ गया। जिस चाबुक से वह घोड़े चलाता आया था, उसी से उस व्यक्ति को मारने लगा। चाबुक से उस व्यक्ति के शरीर पर नीले-नीले निशान पड़ गए...